❤️श्री रासबिहारी❤️

 
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नवल व्रजराजको, लाल ठाढो सखी, ललित संकेत वट, निकट सोहे । देखरी देख, अनिमेष या वेषको, मुकुटकी लटक, त्रिभुवनजु मोहे ॥ १ ॥ स्वेदकण झलक कछु, झुकीसी रहेत पलक, प्रेमकी ललक, रसराज किये । धन्य बडभाग, वृषभान नृपनंदिनी, राधिका अंस पर, बाहु दिये ॥ २ ॥ मणिजटित भूमि पर, नवलता रही झूम, कुंजछबि पुंज, वरणी न जाई । नंदनंदन चरण, परसहित जान यह, मुनिनके मनन मिल, पांत लाई ॥ ३ ॥ परम अदभुत रूप, सकल सुख भूप यह, मदनमोहन बिना, कछु न भावे । धन्य हरिभक्त, जिनकी कृपा तें सदा, कृष्ण गुण, गदाधर मिश्र गावे ॥ ४ ॥
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